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06 Sep, 2026

🚩 “एकादशी व्रत: श्रीहरि भक्ति, आत्मसंयम और साधना का पावन पर्व” 🚩

परमपूज्य पीठाधीश्वर | 44 Views | Sri Hanumat Siddha Peeth
🚩 “एकादशी व्रत: श्रीहरि भक्ति, आत्मसंयम और साधना का पावन पर्व” 🚩
परमपूज्य पीठाधीश्वर
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🚩 “एकादशी व्रत: श्रीहरि भक्ति, आत्मसंयम और साधना का पावन पर्व” 🚩
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एकादशी व्रत: संयम से समर्पण तक

भक्ति, उपवास, आत्मचिंतन और भगवान विष्णु के स्मरण की सनातन परंपरा

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

॥ श्रीहरये नमः ॥

॥ जय श्रीराम ॥

॥ जय बजरंगबली ॥

सनातन धर्म की साधना परंपरा में एकादशी का विशेष स्थान है। प्रत्येक मास में आने वाली एकादशी तिथि को भगवान श्रीहरि विष्णु के स्मरण, व्रत, संयम, जप, प्रार्थना और आत्मचिंतन के लिए पवित्र अवसर के रूप में माना जाता है।

एकादशी केवल भोजन का त्याग करने का दिन नहीं है। इसका व्यापक आध्यात्मिक भाव है, अपने जीवन की गति को कुछ समय के लिए संयमित करना, इंद्रियों पर नियंत्रण का अभ्यास करना, मन को भगवान के स्मरण में लगाना और अपने भीतर झाँकना।

इसीलिए एकादशी को केवल उपवास के रूप में नहीं, बल्कि आत्मअनुशासन और ईश्वर समर्पण की साधना के रूप में समझना अधिक सुंदर है।

एकादशी क्या है?

‘एकादशी’ का सामान्य अर्थ है, चंद्र पक्ष की ग्यारहवीं तिथि।

शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष, दोनों में एकादशी आती है। सामान्यतः एक वर्ष में चौबीस एकादशियाँ आती हैं। विशेष पंचांग परिस्थितियों में एकादशियों की संख्या में परिवर्तन भी हो सकता है।

सनातन परंपरा में एकादशी के दिन भगवान विष्णु और श्रीहरि के विभिन्न नामों का स्मरण, पूजा, जप, व्रत, सत्संग और धार्मिक चिंतन करने की परंपरा रही है।

एकादशी हमें बाहरी संसार से भागने का संदेश नहीं देती, बल्कि अपने भीतर थोड़ी देर रुककर स्वयं को देखने की प्रेरणा देती है।

व्रत का वास्तविक अर्थ

‘व्रत’ केवल भूखा रहने का नाम नहीं है।

व्रत का अर्थ है, किसी श्रेष्ठ संकल्प को धारण करना और उसके प्रति स्वयं को अनुशासित रखना।

यदि कोई व्यक्ति एकादशी के दिन भोजन में संयम रखता है, लेकिन उसके मन में क्रोध, अहंकार, द्वेष और कटुता बनी रहती है, तो व्रत की आध्यात्मिक भावना अधूरी रह सकती है।

वास्तविक साधना तब है, जब बाहरी संयम के साथ भीतर भी शुद्धता और सजगता का प्रयास किया जाए।

इसलिए एकादशी के दिन हम स्वयं से पूछ सकते हैं,

क्या मैं अपनी वाणी पर संयम रख सकता हूँ?

क्या मैं किसी के प्रति अनावश्यक क्रोध से बच सकता हूँ?

क्या मैं किसी जरूरतमंद की सहायता कर सकता हूँ?

क्या मैं कुछ समय भगवान के नाम का स्मरण कर सकता हूँ?

क्या मैं अपने भीतर के अहंकार को पहचानने का प्रयास कर सकता हूँ?

यही प्रश्न एकादशी को हमारे जीवन से जोड़ते हैं।

भगवान विष्णु और एकादशी

वैष्णव परंपरा में एकादशी भगवान श्रीहरि विष्णु की भक्ति से विशेष रूप से जुड़ी हुई है।

भगवान विष्णु को सनातन परंपरा में पालन और संरक्षण के दिव्य भाव से जोड़ा जाता है। इसलिए एकादशी का साधक अपने जीवन में भी संरक्षण, संतुलन, करुणा और धर्म के भाव को विकसित करने का प्रयास कर सकता है।

एकादशी के दिन भगवान विष्णु के नामों का जप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, भगवद्गीता का अध्ययन, भगवान के स्वरूप का ध्यान या सरल प्रार्थना की जा सकती है।

साधना का मूल भाव दिखावा नहीं, श्रद्धा है।

उपवास का आध्यात्मिक संदेश

उपवास शब्द को केवल भोजन से दूरी के अर्थ में देखना आवश्यक नहीं है।

‘उपवास’ का एक सुंदर भाव है, ईश्वर के समीप रहना।

जब साधक अपनी दिनचर्या में कुछ समय भोजन, मनोरंजन, अनावश्यक बातचीत और अन्य सांसारिक व्यस्तताओं से संयम रखकर भगवान के स्मरण में लगाता है, तो वह अपने भीतर एक शांत स्थान बनाने का प्रयास करता है।

उपवास हमें यह स्मरण करा सकता है कि जीवन की सभी आवश्यकताएँ केवल भौतिक साधनों से पूरी नहीं होतीं।

मनुष्य को शांति, संतोष, श्रद्धा और आत्मिक संतुलन की भी आवश्यकता होती है।

एकादशी और मन का अनुशासन

मन निरंतर किसी न किसी विषय की ओर दौड़ता रहता है।

कभी इच्छा के पीछे, कभी चिंता के पीछे, कभी क्रोध के पीछे और कभी भविष्य की कल्पनाओं के पीछे।

एकादशी साधक को अपने मन को थोड़ी देर के लिए एक दिशा देने का अवसर देती है।

भगवान का नाम जपते हुए, प्रार्थना करते हुए या किसी आध्यात्मिक ग्रंथ का अध्ययन करते हुए मन को बार बार ईश्वर की ओर लौटाना भी एक साधना है।

मन का भटकना असफलता नहीं है।

हर बार उसे प्रेमपूर्वक भगवान की ओर वापस लाना ही अभ्यास है।

एकादशी के आध्यात्मिक लाभ

एकादशी व्रत के लाभों को केवल सांसारिक उपलब्धियों या चमत्कारों से जोड़ना उचित नहीं है।

इस व्रत का महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पक्ष साधक के भीतर आत्मअनुशासन और आत्मचिंतन की भावना का विकास है।

एकादशी के माध्यम से व्यक्ति,

संयम का अभ्यास कर सकता है।

नियमित प्रार्थना की आदत विकसित कर सकता है।

ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा को गहरा कर सकता है।

अपने आहार और दिनचर्या के प्रति सजग हो सकता है।

अनावश्यक इच्छाओं पर विचार कर सकता है।

वाणी और व्यवहार में संयम लाने का प्रयास कर सकता है।

दान, सेवा और परोपकार की भावना को बढ़ा सकता है।

अपने जीवन की प्राथमिकताओं पर शांतिपूर्वक विचार कर सकता है।

ये बातें किसी चमत्कार के दावे नहीं हैं, बल्कि व्रत और साधना से जुड़े आध्यात्मिक अनुशासन के उद्देश्य हैं।

एकादशी और भगवद्भक्ति

भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में भक्ति के महत्व को अत्यंत सरल भाव से बताते हैं।

“पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥”

श्रीमद्भगवद्गीता 9.26

अर्थात् जो भक्त प्रेम और भक्ति से पत्र, पुष्प, फल या जल भी अर्पित करता है, भगवान उस भक्तिभाव से किए गए अर्पण को स्वीकार करते हैं।

यह संदेश एकादशी की साधना को भी सुंदर दिशा देता है।

ईश्वर के सामने सबसे महत्वपूर्ण केवल बाहरी सामग्री नहीं, बल्कि उसके पीछे का भाव है।

एकादशी के दिन किया गया छोटा सा जप, एक दीपक, एक सरल प्रार्थना, किसी भूखे को भोजन, किसी जरूरतमंद की सहायता या किसी दुखी व्यक्ति के प्रति करुणा, यदि श्रद्धा से किया जाए, तो वह साधक के लिए आध्यात्मिक अभ्यास बन सकता है।

एकादशी के दिन क्या करें?

एकादशी के दिन अपनी सामर्थ्य और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत या आहार संयम रखा जा सकता है।

भगवान श्रीहरि विष्णु का स्मरण करें।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करें।

भगवद्गीता, विष्णु सहस्रनाम या अन्य प्रिय धार्मिक ग्रंथ का पाठ करें।

कुछ समय शांत बैठकर ध्यान और आत्मचिंतन करें।

अपने माता पिता, गुरुजनों और परिवार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें।

जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करें।

सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या अन्य उपयोगी सामग्री का दान करें।

दिन को अनावश्यक विवाद, क्रोध, कटु वाणी और नकारात्मक विचारों से बचाने का प्रयास करें।

सबसे महत्वपूर्ण, व्रत के साथ मन में भी संयम रखें।

एकादशी में आहार से अधिक महत्वपूर्ण भाव

एकादशी का व्रत प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता, स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार कर सकता है।

जो लोग पूर्ण उपवास नहीं कर सकते, वे अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार या सात्त्विक आहार के माध्यम से भी संयम और भक्ति का भाव रख सकते हैं।

वृद्धजन, बच्चे, गर्भवती महिलाएँ, स्वास्थ्य संबंधी समस्या वाले व्यक्ति या नियमित औषधि लेने वाले लोग कठोर उपवास करने के बजाय अपनी स्थिति के अनुसार आहार और व्रत का निर्णय लें।

ईश्वर के प्रति भक्ति शरीर को कष्ट देने की प्रतियोगिता नहीं है।

व्रत का उद्देश्य शरीर और मन को साधना की ओर ले जाना है।

एकादशी और सेवा

सच्ची भक्ति केवल पूजा के स्थान तक सीमित नहीं रहती।

यदि एकादशी के दिन हम किसी भूखे व्यक्ति को भोजन करा दें, किसी जरूरतमंद की सहायता कर दें, किसी दुखी व्यक्ति की बात सुन लें, किसी वृद्ध की सेवा कर दें या किसी जीव के प्रति करुणा रखें, तो हमारी साधना सेवा के रूप में प्रकट होती है।

सनातन परंपरा में धर्म का एक महत्वपूर्ण पक्ष लोककल्याण भी है।

इसलिए एकादशी के दिन भगवान के चरणों में प्रार्थना के साथ समाज और जीवमात्र के प्रति करुणा का संकल्प भी लिया जा सकता है।

श्री हनुमत सिद्ध पीठ की साधना में एकादशी

श्री हनुमत सिद्ध पीठ की साधना परंपरा का मूल भाव है,

भक्ति, साधना, सेवा, संस्कार

इसी भाव से एकादशी को भी देखा जा सकता है।

भक्ति, क्योंकि यह दिन भगवान के स्मरण को समर्पित है।

साधना, क्योंकि व्रत और संयम आत्मअनुशासन का अभ्यास कराते हैं।

सेवा, क्योंकि ईश्वर की भक्ति करुणा और परोपकार की भावना को प्रेरित करती है।

संस्कार, क्योंकि सनातन परंपराओं को समझना और अगली पीढ़ी तक उनके श्रेष्ठ भावों को पहुँचाना हमारा दायित्व है।

एकादशी का संकल्प

इस एकादशी पर केवल भोजन का संकल्प न लें।

एक सुंदर संकल्प लें,

मैं अपनी वाणी में मधुरता लाने का प्रयास करूँगा।

मैं क्रोध पर संयम रखने का प्रयास करूँगा।

मैं किसी के प्रति अनावश्यक द्वेष नहीं रखूँगा।

मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी की सेवा करूँगा।

मैं भगवान का स्मरण करूँगा।

मैं अपने जीवन में सत्य, करुणा, संयम और सद्भाव को स्थान देने का प्रयास करूँगा।

और सबसे बढ़कर,

मैं अपने कर्मों को ईश्वर के चरणों में समर्पित करने का प्रयास करूँगा।

एकादशी हमें क्या सिखाती है?

एकादशी हमें रोकना सिखाती है।

भागती हुई दिनचर्या में कुछ समय रुकना।

इच्छाओं के बीच विवेक को स्थान देना।

भोजन के बीच संयम को याद करना।

शब्दों के बीच मौन को समझना।

व्यस्तता के बीच भगवान का स्मरण करना।

और जीवन की अनेक इच्छाओं के बीच यह याद रखना कि मनुष्य का वास्तविक सुख केवल बाहरी उपलब्धियों में नहीं है।

एकादशी हमें भीतर लौटने का निमंत्रण देती है।

निष्कर्ष

एकादशी सनातन धर्म की एक सुंदर साधना परंपरा है।

यह केवल उपवास का दिन नहीं, बल्कि संयम, भक्ति, आत्मचिंतन, प्रार्थना, सेवा और ईश्वर स्मरण का अवसर है।

इस दिन हम अपने शरीर को ही नहीं, अपने विचारों और व्यवहार को भी अनुशासित करने का प्रयास कर सकते हैं।

यदि एकादशी के बाद हमारे भीतर थोड़ी अधिक शांति हो,

हमारी वाणी में थोड़ी अधिक मधुरता हो,

हमारे व्यवहार में थोड़ी अधिक करुणा हो,

हमारे कर्मों में थोड़ी अधिक निःस्वार्थता हो,

और हमारे हृदय में भगवान के प्रति थोड़ी अधिक श्रद्धा हो,

तो यही इस पवित्र व्रत की सुंदर सार्थकता है।

आइए, इस एकादशी पर भगवान श्रीहरि के चरणों में अपने मन को समर्पित करें।

अपने भीतर के अहंकार को कम करने का प्रयास करें।

अपनी वाणी को मधुर बनाने का प्रयास करें।

किसी जरूरतमंद की सहायता करें।

और अपने जीवन में भक्ति, साधना, सेवा और संस्कार को स्थान दें।

प्रार्थना करें,

हे श्रीहरि विष्णु,

हमारे मन को शांति दें।

हमारे विचारों को पवित्रता दें।

हमारे कर्मों को सद्मार्ग दें।

हमारी बुद्धि को विवेक दें।

हमारे हृदय में करुणा दें।

और हमें ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा दें, जिसमें हमारी भक्ति केवल पूजा तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे आचरण और सेवा में भी दिखाई दे।

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

॥ श्रीहरये नमः ॥

॥ श्री विष्णवे नमः ॥

॥ जय श्रीराम ॥

॥ जय बजरंगबली ॥

परमपूज्य पीठाधीश्वर
श्री अंकितेश्वरानन्द जी महाराज
श्री हनुमत सिद्ध पीठ
संगम क्षेत्र, प्रयागराज

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